बैटिंग की जब बारी आती, सुनता उनकी चीख
वरना कितना भी माँगोगे, नहीं मिलेगी भिक्षा
नाई से कटवा ही देते, जाने क्यों होती उनको टेंशन
मेधावी आवारा हरेक विद्यार्थी, भाता था ये सबको
मौज मस्ती का दौर चला, जिंदगी हुई मस्त बिंदास
पिक्चर देखो नगर में घूमो, बने रहो बकलोल
पढ़ने से फुरसत न मिलेगी, पिता को रहे बनाते उल्लू
पिता ने तय किया लगन, पत्नी भी आ गई
साल वर्ष भी न मिलता, नहीं शिकायत पिता था सुलझा
पिता आपके नहीं रहे अब, ले लो फूल चढ़ाओ माला
कैसा पुत्र अभागा था मैं, नहीं कर सका दर्शन अंतिम
अपनी पसंद की पत्नी लाया, वर्षों जिसका रहा दीवाना
जीवन का पूर्ण निवेश, सब कुछ इसमें डाला है
रंग ढंग सब बदला दिखता, बदल गया परिवेश
एक दिन अपनी पत्नी लेकर, निकल गया परदेश
हफ्तों हफ्तों खबर न आए, सन्नाटों का सूना मेला
इसी योनि में वापस मिलता, व्याज सहित वो फंड
आज उपेक्षित मुझे भी कर रहा, मेरा ही अपना अंश
बुरा बने स्वयं पर मुझे उकेरा, कैसा था अद्भुत दान
नित्य लिखूँगा चिट्ठी तुमको, भेजा करो एक यमदूत
आजा पिता बरसों हो गये, न गया सिनेमा हाल
प्रायश्चित हेतु कालचक्र तुम्हें, वापस नहीं ले जाता
इसी मिट्टी में जन्मे हैं, कितने ही श्रवण कुमार

