Aug 2, 2023

घोंसला

 

तपती गर्मी या हो बरसात
काम ही काम करे दिन रात
तिनका चुनकर बुने घोंसला 
बैठ दो घड़ी करे न बात
 
दो युगल पक्षियों का अनोखा साथ
विधाता ने दिया नहीं एक भी हाथ 
चोंच से ही रच दिया एक ऐसा आशियाना
उच्च श्रेणी इंजीनियर भी हो जाये दीवाना
 
भूल गये दर्द गाड़ दिए खुशियों के झंडे
जब मादा गौरैया ने जन दिए चार अंडे
माँ अंडों को सेती रहती फैलाए दोनों डैने
पिता बाहर से चुनकर लाता दाना और चबैने
 
दुनिया सिमट गई जब निकले प्यारे चूजे
उनकी सेवा में ऐसे रमे काम न भाये दूजे
एक जाये जब दाना लाने तो दूजा करे रखवाली
पिता हो विभोर जब बच्चों को खाना दे घरवाली
 
प्यारे बच्चों के कलरव से, गुंजित रहा भरा परिवार
सरपट झटपट निकल गये, तीन हफ्ते यूँ खुशगवार
आओ बाहरी दुनिया दिखा दूँ, अब तुम हुये सयाने
पर फैला के उड़ना ऐसे, माता-पिता लगे बतलाने 
 
दसवें दिन वो चारों चूजे, घर से निकले उड़कर
साँझ ढले न वापस आये, चिंता लगी भयंकर
सारी रात बेचैन पड़े वो, रहे बदलते करवट पलपल
खबर मिली अब ना आयेंगे, चला गया बच्चों का दलबल
 
सूना हुआ घोंसला उनका, रहा नहीं कलरव संगीत
मुँह में गया न एक भी दाना, दुनिया हो गई रीत
चिड़ा चिड़ी ने अवसादों में, छोड़ दिया पूरा घर बार
कैसे रह पाएंगे इसमें, बच्चों की याद करेगी बीमार  
 
निकल पड़े फिर दोनों पक्षी, अपनी अगली यात्रा पे
सुखा दिए सब गम के आँसू, पूरी पूरी मात्रा  में
रम गये फिर से उसी काम में, तिनका तिनका जुटाने में
बिना हाथ के उसी चोंच से, एक नया मकान बनाने में
 
कह डी के कविराय, बुजुर्गों खुश रहने का यही सलीका
छोड़ो उड़ने दो बच्चों को, सीख लो पक्षियों वाला तरीका

Jul 18, 2023

हिन्दुत्व

एक दिन बैठे बड़ बड़ ज्ञानी, धर्मगुरुओं का हुआ आगाज
सारे धर्म वास्तव में क्या है, चलो मीमांसा कर लें आज

 

विश्व के विभिन्न धर्मों के, नियम कानून बताते जाते

क्या करना क्या नहीं करना, सबका सीमांकन करवाते

 

हिन्दू धर्म की बात चली तो, बोले पण्डित से पादरी काजी

हम करते हैं इसकी व्याख्या, तुम करते जाओ हाँजी नाजी।

 

बुतपरस्ती ही करते तुम सब, उसके बिना चले न काम

रामायण का वाचन करते, माला जपते राम और श्याम

पण्डित बोले नाजी नाजी, वेदों में नहीं सगुण साकार

निर्गुण कबीर रैदास जायसी, महिमा गाते ब्रह्म निराकार

 

घण्टा और घड़ियाल बजाते, भजन कीर्तन से करते हल्ला

बिना शोर भगवान मिलें न, उठकर बोल पड़ा एक मुल्ला

सहजयोग में गहन ध्यान हो, परम शांति की चिरनिद्रा निलय  

अँतर्मुखी शक्ति प्रज्वलन से होता, कुण्डलिनी का ब्रह्म विलय

 

माँस मछली खाते नहीं, शाकाहारी का बन गया रिवाज

सबसे बड़ा हिन्दू तो वो है, जो न खाये लहसुन व प्याज

बंगाली आसामी नेपाली, खाते माँसाहार बारहों मास

दुर्गापूजा नवरात्रि पे भी, बलि से बुझती देवी तास

 

ऐसी चर्चा सुनकर भैया, धर्मगुरुओं का गरम हुआ मिजाज

परिभाषित हम करें तो कैसे, कोई तो युक्ति बताओ आज

धीरज रख के ध्यान धरो अब, पण्डित का निकला उद्गार

हिन्दुत्व एक अनोखा यंत्र है, जिसके तारों से हो यलगार

 

सनातन है नाम इसका, आदि है न अंत

बाँध सके न परिभाषा, महिमा इसकी अनंत

ऊपर विशाल नीला व्योम, कहाँ है उसका अंत

कालचक्र कब हुआ आरंभ, कब होगा घूमना बंद  

 

तो इसको रचने वाला ईश्वर, कैसे बंधेगा तुमसे दैया

बालयोगी श्याम को भी, न बाँध सकी थी उसकी मैया

निर्गुण सगुण हिंसक अहिंसक, या हो मांसा शाकाहारी

नास्तिक भी हिन्दू कहलाकर, हो जाते हैं  बलिहारी

 

सब पंथों के ग्रंथों की बातें, पत्थर की होय लकीर

नहीं बदलते इंच मात्र, जो कह गये उनके फकीर

समाज सुधार का अल्प प्रयास, मार बना देगा हलवा

विश्व के कितने कोनों से, निकल पड़ेगा ढेरों फतवा   

 

मानव समाज के हर सुधार का, सनातन करता स्वागत

नानक महावीर गौतम कबीर, न जाने कितने आवत  

बहुविवाह बालविवाह विधवाविवाहनिषेध, सती दहेज उत्पीड़न  

संसद में कानून बना, इन कुरीतियों का कर डाला उन्मूलन

 

जहाँ विश्व के अन्य धर्मों में, पृथ्वी पर ईश्वर दूत ही आये

जीसस गॉड का तो मोहम्मद अल्ला का, पैगाम यहाँ सुनाये

वहीं सनातन आस्था में देखो, ईश्वर ने स्वयं लिया अवतार  

राम श्याम वामन वराह नरसिंह बनकर, आते गए दस बार 

 

भगवद्गीता श्लोकों के ज्ञान का, विज्ञान भी मानता सानी

क्योंकि यह साक्षात ईश्वर के मुख से, है निकली हुई वाणी

वसुन्धरा की सनातन संस्कृति, विश्व-गुरुओं का केंद्र बिन्दू है

सनातनियों क्यों इतना सकुचाते ही, गर्व से कहो हम हिन्दू हैं  

Jul 17, 2023

नया माल

एक लखनवी नवाब
पीते शराब
खाते कबाब
शौकीने शबाब

हुस्न को परखते थे
जुल्फों में उलझते थे
किस रक्कासा की हैं जुल्फें
सूँघ के ही बकरते थे

ये है महरुन्निसा की
ऊपर वाली चमेलीबाई
दाहिने है रुखसाना की
तो बाएं पड़ी है जोहराबाई

बीरबल का पोता लखनऊ आया
मसखरी करने का शौक चर्राया
गधी के बाल थैली में भरवाया
नवाब के सामने पेश करवाया

सूँघ के नवाब होते रहे हलकान
बढ़ती गई खीझ हुये परेशान
फिर जोर से चिल्लाये, नवाब ने अता फरमाया है
कोचवान इरफान, बग्घी निकालो, लखनऊ में नया माल आया है

Jun 17, 2023

लखनऊ मीट

चाह नहीं पुलिस बन रिक्शेवालों पे डंडा बरसाऊँ
चाह नहीं वकील बन झूठ का पुलिन्दा फैलाऊँ
चाह नहीं प्रोफ़ेसर बन क्लासरूम में ही रह जाऊं
चाह नहीं डाक्टर बन आधी रात को दौड़ा जाऊं
चाह नहीं आईएएस बन नेताओं से गाली खाऊँ 
मुझे बना देना तुम भगवन, दे देना एक ऐसा मन्त्र
मानवता के लिए समर्पित, बनाता जाऊँ नूतन  यंत्र  
 
आईआईटी में दिया नहीं आया, रुड़की में दिया नहीं आया.
इंजिनियर बनना नहीं भाग्य में, चराओ भैंस धरमेंदर भाया
तभी मोहल्ले का डाकिया आके, बत्तीसी निकाल हाथ लहराया  
बस्ते से निकाल, मालविया में सेलेक्शन का लिफाफा दिखलाया
 
हनुमानजी को लड्डू चढ़ाया, कई बार था माथा रगडा
साहूकार नरम पड़ गया, वसूली में तोड़ गया था जबड़ा
पत्नी अब सुन्दर मिलेगी, दोस्तों में भारी हो गया पलड़ा
अड़ोसी-पड़ोसी जलने लगे, साले को दहेज़ भी मिलेगा तगड़ा
 
भाई साहब, वार्डन से मिलने का कुछ तो बताओ जतन 
उसने कहा, फ्रेशर हो साले, पहले देखो अपना थर्ड बटन
मलावियन सॉंग व ऐन्थेम से, करो इस कालेज को नमन
फर्शी सलाम ठोंकते हुए, फिर यहाँ से करो वार्डन को गमन.
 
मैंने कहा कुछ समझ आया नहीं, रक्षा करो हे माँ दुर्गा
उसने कहा सब समझ आ जाएगा, पहले तू बन जा मुर्गा.
 
कालेज में एडमिशन लिया, कुछ मित्र भी बन गए
खूँखार सीनियरों को देख मगर, हम बहुत ही डर गए
शाम को भाग के सारे मित्र, शहर में गोलघर पहुँच गए
पार्क सिनेमा हाल ट्रेन का डब्बा, कहीं पे भी लटक गए.
 
रात भर सोने न दें, सुबह भी जगा दें तड़के
ज़रा भी ना नुकर किया, तो दे तमाचा जडके
घर वालों से कही, तो वो अलग से भड़के
मन तुम्हारा लगता नहीं, पढाई करो जमके
 
रैगिंग का अंत होता नहीं, बीत गए दो मॉस
इससे तो बेहतर था, मैं गाँव में छीलता घास
वर्ष युग के सामान लगे, हर पल हर एक सांस
हे बजरंगी अब ख़तम करो,  ये अंतहीन वनवास
 
तीन महीने बाद एकदम, छप्पर फाड़ वो ख़ुशी आई 
फ्रेशर पार्टी की नोटिस जब, हॉस्टल में पडी दिखाई
पंकज का गीत व शर्मा का नृत्य, अदा सबको भाई
सीनियर जूनियर सब हुए समान, ख़त्म हुई बीच की खाई  
 
तीनों बटन अब खोल के चलते, हम भी बन गए पूरे दादा
पढाई लिखाई कभी न होती, बस हल्ला करते रहते ज्यादा
हाकी राड और कट्टा रखते, सबसे लड़ने पे आमादा
परीक्षा जब सर पे आ गयी, तो दिखाई देने लगे परदादा
 
तिवारी से माँग सिलेबस लाया, पढूँ कहाँ कौन से छोर
कमरे से बाहर विंग में तभी, होने लगा यकायक शोर
परीक्षा टालो पीछे करो, जयदीप लगाये नारा जोर
सारे बकैत सहमत हुए, चला हुजूम प्रिंसिपल की ओर
 
आखिरी पेपर देने के बाद, ट्रेनों में पूरा कब्जा जमा बैठे
वानरी सेना ये नोच खाती, यदि डब्बे में कोई ज़रा भी ऐंठे
रेलवे कंसेसन पर डीन के ठप्पे, हास्टल में ही लग जाते थे।
रेल यात्रा में सारे मालवियन, केवल हरिजन कहलाते थे।
 
जैसे पतंगा हो सम्मोहित, देख जलता हुआ दिया।
विरहिणी के लिए जैसे उसका, बिछड़ा हुआ पिया।
किसी युद्धबंदी ने जैसे, अपना वतन पा लिया।
वैसे हम भूतपूर्व-छात्रों के लिए, होता था मालविया।

मित्रों के संग घूम टहल , गन्ना अमरुद उड़ाते थे।
गोलघर में तितलियों के पीछे, लम्बी रेस लगाते थे।
कुछ को खोराबार के जंगल ही, ज्यादा रास आते थे।
ढाबे में इतना खा लिये, बाबूलाल पैरों में गिर जाते थे।
निर्दयी वार्डेन सर्द रातों में, हमारा हीटर उठा ले जाते थे।
साथी दोस्त के लिए झगडा कर, अपना सर भी फुड़वाते थे।
पास होने पर उस दोस्त से दुबारा, शायद ही मिल पाते थे।
परीक्षा टलवाने के लिए हम भी, प्रिंसिपल तक को हड़काते थे।
 
क्या क्या सुनाऊँ, तीन सौ एकड़ मालविया से कितना गहरा नाता है
खेत से ताजा गन्ना चूसे कोई, किसी को बाग़ का अमरूद ही भाता है
कोई आम का टिकोरा तोड़े, कोई ऊँचे पेड़ वाली ताड़ी पीने जाता है
कोई टीचर्स कालोनी में निहारे, तो कोई जीनत अमान की रोटी खाता है
कोई यादव के समोसे पे लट्टू, तो कोई मुंशी-ढाबे पे जीमने जाता  है
 
छोड़ दूँ 72 हूरतोड़ भागूं इंद्रलोक के ताले।
मिल जाय बिछड़े यार संग, जाम के चंद प्याले।
कह डीके कविराय, मरने के बाद जब भी ऊपर जाऊँगा,
अंतिम इच्छा के रूप में, वहाँ भी एक मालविया मागूँगा.

May 27, 2023

वो बचपन


 
होश आया तो अम्मा के आँचल का नहीं किनारा था
परिवार-बोझ में व्यस्त पिता को भी कहाँ निहारा था
मातृ-छाया विहीन, समाज की ज्वाला तले संघर्षरत
जीवन पथ पर दो मासूम बहनों का मिला सहारा था
 
एक हाथ में पुस्तक, दूजे से सुलगाती गीली लकड़ियाँ
चूल्हा फूंकते राखरंजित नेत्र, रण-बाँकुरी दो लड़कियाँ
चाय नाश्ता सबको देकर, मध्यान्ह पकवान तैयार किया
विद्यालय से आकर रात्रिभोजन, क्या क्या बतलायें मियाँ
 
छोटे नगर के कन्या विद्यालय में न थी लेबोरेट्री की थाती   
वरना गणित विज्ञान पढ़ वो डाक्टर इंजीनियर बन जाती
सामाजिक बंधनों की तीव्र ज्वाला में जलने वाली वो बाती 
अग्निशिखरों पे आरूढ़ हो कुंदन सी और निखरती जाती 
 
हम तीनों अक्सर लड़ते थे, बात बात पर झगड़ते थे
दूसरे ही पल फिर भूल बिसर के, एक दूजे पे मरते थे
आज एक के पीछे दो माँ-बाप, चम्मच लिए फिरते हैं,
कह डीके कविराय, भला कैसे हम वो जीवन जीते थे

May 15, 2023

कलयुगी असुर

 
क्षीर सागर में नाग-शैया पे लेटे हुये नारायण की कमर में अकड़न हो चली थी। लक्ष्मी जी ने बहुतेरे प्रयास किये पैर दबा दबा के,  कथा सुना सुना के, किन्तु बोरियत दूर न हो पा रही थी।
 
अंततः लक्ष्मी जी ने कहा, “प्रभु आप नारद मुनि का आह्वान कीजिये। उनके चटपटे मसालेदार वर्णन ही आपका जायका सही करेंगे।
 
विष्णु जी ने नारद मुनि का आकस्मिक आह्वान किया। वो क्षण भर में प्रकट हो गए।
 
नारायण नारायण। प्रणाम स्वीकार हो प्रभु”।
 
कहिये नारद मुनि, मृत्युलोक के क्या समाचार हैं?”
 
समाचार अच्छे नहीं हैं प्रभु”।
क्यों क्या हुआ?”
 
बड़ी विकट स्थिति हो गई है। सब कुछ उलट पलट हो गया। शीतकाल में गर्मी का प्रकोप हो गया है। ग्रीष्म ऋतु में लू का प्रवाह बंद हो गया। चैत्र मास के पश्चात सीधे सावन भादों की झड़ी लगी हुई है। किसानों की फसल पकने से पहले ही सड़ जा रही”।
 
ऐसा क्यों हो रहा? इंद्रदेव ने हमारे बनाये नियमों का उल्लंघन क्यों किया?”
 
अब ये तो वही जाने प्रभुवर। आपकी पकड़ ढीली हो रही है प्रशासन पर। देवगण अपने मन के मालिक होते जा रहे”, नारद मुनि ने अपने गुणों के अनुरूप आग में घी डाला।
 
नारायण दहाड़े, “गरुड, तुम शीघ्र जाओ और देवराज इन्द्र को प्रस्तुत करो”।
 
जो आज्ञा नाथ”, कहकर गरुड वायुवेग से प्रस्थान कर चले। कुछ ही क्षणों में इन्द्र को अपने साथ बिठा लाए। इन्द्र का वाहन हाथी भी गरुड के पंजे में दबा था। यदि इन्द्र अपने वाहन पे आते तो कई दिन लग जाते।
 
उन्हें देखते ही नारायण उबल पड़े, “देवराज, मेरे द्वारा स्थापित नियमों का उल्लंघन क्यों हो रहा है? वैशाख व जेठ मास में वर्षा क्यों हो रही है?”
 
क्षमा प्रभु, किन्तु इसमें मेरा कोई दोष नहीं है। आर्यावर्त के लिये बना सॉफ्टवेयर ‘मौसम’ करप्ट हो गया है। उसकी सुरक्षा में तैनात अग्निकवच (फायर वाल) को दानवों ने विषाणुआस्त्र से भेद दिया है। इसलिए गर्मी में वर्षा और शीत ऋतु में ताप-वृद्धि हो जाती है”।
 
अग्नि-कवच किस देव की उपासना से प्राप्त किया था इन्द्र?”
 
इसे नारायण ने दिया था प्रभु”।
 
क्या अनर्गल प्रलाप कर रहे हो इन्द्र। मेरा दिया अस्त्र कभी कोई भेद नहीं सकता। कब दिया यह अस्त्र मैंने तुम्हें?”
 
क्षमा प्रभु क्षमा, मैं आपकी बात नहीं कर रहा हूँ। मैं आर्यावर्त में बसे हुये नारायण की बात कर रहा हूँ। इनकी संस्था इन्फोसिस ने यह अग्निकवच डिजाइन किया था”।
 
किसी मानव से क्यों ले लिया युद्ध का अस्त्र? यह भला दानवों के विरुद्ध कहाँ टिक पाएगा?”
 
अब नारद मुनि आगे आये, “प्रभु, आज का दानव अति चालाक है। इसके आगे देव अस्त्र निष्प्रभावी हो जाते हैं। इससे आईटी दिग्गज ही टक्कर ले सकते हैं”।
 
कौन है यह दानव? कहाँ है निवास इसका?” 
 
त्रेता युग में दक्षिण दिशा लंका से राक्षस राज रावण ने कहर बरपाया था। द्वापर में आर्यावर्त के केंद्र हस्तिनापुर व मथुरा में दुर्योधन व कंस का तांडव हुआ। यह राक्षस प्रवृत्ति उत्तरोत्तर उत्तर दिशा की ओर ही उन्मुख हो रही। अब कलयुग में उत्तर दिशा में स्थित ‘चाइनीज ड्रैगन’ नामक दैत्य की उत्पत्ति हुई है जिसने समस्त भूमंडल में हाहाकार मचा रखा है”।
 
नारायणमूर्ति कितने कारगर होंगे इस ड्रैगन के विरुद्ध?”
 
नारद मुनि ने बीच में एंट्री मारी, “प्रयास वो बहुत कर रहे प्रभु। उन्होंने अपनी कन्या अक्षता का विवाह आंग्ल-देश के एक ऋषि से किया था। कन्या के प्रबल भाग्य से आज वह ऋषि आंग्ल देश का नरेश बन गया है। कहा तो ये भी जाता है कि उस ऋषि को नरेश बनाने में नारायण ने अपने धन बल का भरपूर प्रयोग किया”।
 
नारायण नाम की महिमा ही अपरंपार है,” इंद्रदेव ने मस्का मारा।
 
विष्णु ने टोका, “किन्तु आंग्ल देश कितना प्रभावी होगा? क्या यह ड्रैगन-दैत्य के विरुद्ध विजय दिला सकता है?”
 
प्रभु आज मृत्युलोक में आंग्ल-भाषा ही सबसे प्रबल हैं। आंग्ल-वंशियों ने इंग्लैंड अमेरिका कनाडा आस्ट्रेलिया जैसे प्रबल राष्ट्रों पे अधिपत्य जमा रखा है। आंग्लदेश इन आंग्ल-वंशियों का उद्गम स्थल है। और इनके ऊपर बैठा  नरेश हमारे आर्यावर्त का आर्यवंशी आर्यपुत्र ऋषि सुनक है। इस तरह अप्रत्यक्ष रूप से आर्यवंशियों का प्रभुत्व समस्त विश्व पर हो गया”।
 
नारायण संतुष्ट हुये, “हमारे आर्यावर्त का नरेश कौन है, और वो क्या कर रहा है? क्या वो सुषुप्तावस्था में चला गया है?” 
 
नारद जी ने पुनः अपना ज्ञान उड़ेला, “तुलसीदास कालिदास व गौतम बुद्ध की ही तरह अपनी पत्नी को त्याग देने वाला नरेंद्र है प्रभु।“
 
और मेरे अवधपुरी मथुरा वृंदावन गोकुल में कौन अधिपति है?”
 
एक योगी है नारायण। इसने तो विवाह किया ही नहीं। बालकाल से सन्यासी है”।
 
नारायण ने पहलू बदला, ”योगी सन्यासी गुरु लोग समाज के अधिष्ठाता बने हैं। फिर तो आर्यावर्त विश्व गुरु बन गया होगा?”
 
इस दिशा में प्रयास प्रबल वेग से चल रहा है। 21 जून को समस्त विश्व में योग दिवस मनाया जाता है। बाधा है तो बस यह ड्रैगन ही। इसके साथ सीमाओं पे हमारी सेना संघर्षरत है। यह हमारे राजकोष (बैंकिंग सिस्टम) को भी विषाणुअस्त्र से अपंग बनाने की कुचेष्टा करता रहता है।“
 
ठीक है। नरेंद्र और योगी से कहो ड्रैगन दैत्य का अंत शीघ्र करें। कलयुग में हम अवतार नहीं लेते। यदि दैत्य प्रबल हो गया तो पृथ्वी का विनाश हो सकता है। हमारे आराध्य महादेव ताक लगाए बैठे हैं कलयुग के पश्चात प्रलय लाने हेतु। कहीं ड्रैगन दैत्य इस प्रलय का माध्यम न बन जाय। आसुरी शक्तियों का विनाश या नियंत्रण ही कलयुग की अवधि दीर्घ करेगा, और मानव को प्रलय से दूर रखेगा”। 
 
नारद ने अतिरिक्त सूचना दी, “नारायण, आर्यावर्त में भी कुछ लघु राक्षस विचर रहे हैं”।
 
तो क्या मोदी-योगी द्वय इनका उन्मूलन नहीं कर रहे?”
 
कर तो रहे हैं प्रभु, किन्तु दोनों का मार्ग भिन्न है”।
 
वो कैसे?”
 
मोदी इन राक्षसों के प्रति कोमल मार्ग अपनाते हैं। कड़ी कार्यवाई नहीं करते। यदा कदा झुक भी जाते हैं। इंद्रप्रस्थ के शाहीन बाग में दानव-वधुओं ने राजमार्ग 6 मास तक बाधित किये रखा। तदपि मोदी ने कोई कदम नहीं उठाया प्रजा को इस कष्ट से मुक्ति दिलाने हेतु। किसान उपज के दलालों ने तो राजकिले पर अपना ध्वज भी लहरा दिया था। राजधानी को घेर के रखा। राजा ने किसानों की भलाई हेतु अपने द्वारा बनाया कृषि-कानून, जो समस्त सभासदों के द्वारा ध्वनिमत से पारित हुआ था, को तिलांजलि दे किसान-दलालों को उश्रृंखल बना दिया। प्रजा में किसान वैसे भी त्रस्त हैं इंद्रदेव के मौसम की उल्टा पलटी से”।
 
इसमें मेरी कोई गलती नहीं है मुनिवर। आप मीडिया लोगों को बात का बतंगड़ बनाने की आदत है”, इन्द्र ने विरोध व्यक्त किया।
 
विष्णु ने बीच बचाव किया, “आप लोग आपसी मतभेद छोड़ पहले बताइए यह मीडिया क्या होता है”?
 
मीडिया नारद जी की ही प्रजाति के लोग हैं। आज ये लोग जनता को अपनी मनमर्जी अनुसार सही गलत समाचार दे राष्ट्र का तख्तापलट भी करने की ताकत रखते हैं। जिसने पैसा दिया उसके अनुसार समाचार छापेंगे। उसका गुणगान करेंगे”, इंद्रदेव ने अपनी जानकारी रखी।
 
यह तो बड़ा ही निकृष्ट कार्य है। प्रशासन उनके इस निकृष्ट नैतिक आचरण के लिए दंडित नहीं करता?”
 
नैतिक आचरण की तो बात ही छोड़ दीजिये प्रभु। प्रशासन के लोग जिन्हें जनता चुनती है, अपने लिए जीवन भर पेंशन यानि राजकीय कोष से वेतन प्राप्त करते हैं। यह पेंशन समस्त राजकर्मियों के लिये प्रतिबंधित कर दी गई है, यहाँ तक कि राजसेना के सैनिकों के लिए भी। मात्र 4 वर्षों के लिए अग्निवीर लिए जाते हैं, जिन्हे सेवानिवृत्ति पश्चात कुछ नहीं मिलता। और ये शासन के नेता यदि 3 बार चुनाव जीते तो 3 पेंशन मिलेगी"।
 
शिव शिव। कितना ह्रास हो गया है नैतिक मूल्यों का। अब यह बताइये योगी का शासन कैसा है हमारी अवधपुरी में?”
 
बेहतर है प्रभु। आपके अयोध्या में विशाल राम मंदिर का निर्माण हो रहा। रामलला की मूर्ति निर्माण हेतु सीता माता के नैहर में प्रवाहित काली-गण्डकी सलिला से सालिग्राम प्रस्तर आयातित किये गये हैं”।
 
नारायण की मुखमुद्रा पे संतुष्टि के भाव प्रकट हुये, “राजा तो रामभक्त लगता है। उसका कल्याण हो। उसका शासन कैसा है?”
 
अति कठोर है प्रभु। शाहीन बाग की कुछ दैत्य-कन्याओं ने उनकी राजधानी लखनपुर में हाहाकार मचाना चाहा। योगी ने उन सबको मार मार भगा दिया। कई दशकों से प्रजा का रक्तपिपासु मुख्ताराक्षस पंजप्रदेश के सरक्षण में विलासपूर्ण जीवन जी रहा था। योगी उसे अपने प्रदेश में उठवा लाये। कठोर कारावास में रखा है”, नारद ने सूचित किया।
 
यह कार्यवाई उचित तो है, किन्तु कठोर नहीं है। राक्षसों को कारागार में डाल जीवित नहीं रखना चाहिये। वो न जाने कौन सा मायावी रूप धर निकल भागें। कारागार तो सज्जन पुरुषों के लिए होता है। सर्वदा दैत्यों ने सत्पुरुषों को कारागार में रखा, देवों ने नहीं। कंस ने अपने पिता अग्रसेन को, भगिनी देवकी व बहनोई सखा वासुदेव को कैद में रखा। रावण ने भी समस्त देवताओं व संतों को कैद किया। अग्नि वरुण यम तो उनके यहाँ नित्य उपस्थिति देने जाते थे। मुचलके पे छूटे थे। लेकिन हम ईश्वर लोग अत्याचारी पापी राक्षसों का वध कर देते हैं। उन्हें कारगर में पालते नहीं”।
 
आपके ही मार्ग पे चल रहे हैं योगी। प्रयाग नगरी में अतिकासुर नामक राक्षस कई वर्षों से आतंक मचाये हुये था। संतों को कष्ट देना, उन्हें सरेआम बीच चौराहे पे मरवा देना, प्रजा की संपत्ति पे अपना ध्वज टाँग मनमाने सस्ते दाम पे जबरन कब्जा कर लेना, शत्रु राष्ट्र पाकिस्तान से अस्त्र-शस्त्र ले उसके कहे अनुसार आर्यावर्त में दंगा कराना जैसे घृणित कार्य में लिप्त था। न्यायाधीश भी उसके समक्ष भय से उठ खड़े होते थे। हिम्मत नहीं उसके विरुद्ध सजा सुनाने की”।
 
विष्णु ने बेचैनी से करवट बदला, “किन्तु योगी ने क्या किया? यह मेरा मार्ग नहीं है”।
 
मैं उसी बात पे आ रहा था प्रभु। योगी ने अतिकासुर, उसके भ्राता, उसके पुत्र व अनेक अन्य असुरों को मरवा दिया। सरे आम मीडिया के समक्ष उनका वध हुआ जिससे केजरीबवाल इस वध का प्रमाण न माँग बैठें”।
 
अब यह केजरीबवाल कौन है?”
 
यह उसी धोबी का पुनर्जन्मा है प्रभु जिसके कहने पर आपने माता सीता को अयोध्या से निष्कासित कर दिया था। जो माता सीता से उनकी पवित्रता का प्रमाण माँग रहा था। अग्निपरीक्षा के प्रमाण से संतुष्ट नहीं था।  इस जन्म में यह इंद्रप्रस्थ नरेश है। आर्यावर्त के वीर सैनिक शत्रु देश की सीमा में प्रविष्ट हुये गुप्तचर वेश में।  बहुतेरे पापी दानवों का वध कर, सुरक्षित वापसी की। इसे सर्जिकल स्ट्राइक कहा जाता है। उनकी वापसी पर केजरीबवाल उन सैनिकों से वध का प्रमाण माँग रहा था। सेनापति के कथन से भी संतुष्ट न हुआ।  बहुत घुटा हुआ नेता है। जितना जमीन के ऊपर है उसका नब्बे गुना जमीन के नीचे। ईमानदारी का ढोल पीटता सत्तासीन हुआ। कहता था नित्य मेट्रो रेल से राज दरबार में जाऊंगा। कभी लालबत्ती गाड़ी नहीं लूँगा।  वीआईपी संस्कृति से दूर रहूँगा। अपने साधारण घर में रहूँगा। राजकीय आवास नहीं लूँगा। बच्चों की शपथ ली थी, कभी राजनीति में नहीं जाऊँगा। जो कहा, उसका उलट ही किया। उसके बहुत से दरबारी व सहयोगी मदिरा व सोमरस घोटाले में बंदी हैं। इसके विरुद्ध भी अनेक अपराध दर्ज हैं”, नारद मुनि ने एक साँस में सारा कथन कह डाला।

Mar 19, 2023

सुंदरी शृंगार

नहीं बना इस जग में ऐसा, कोई योगी सन्यासी नगीना 
जिसके दिलों को न घायल कर दे, चंचल शोख हसीना  

पहचाने न उम्र की सीमा, न कमजोर बलवान 
चाहे छोटा बच्चा हो, या पचत्तर वर्षीय जवान 

कोई उसकी खनकती हँसी का दीवाना 
तो किसी को मादक मुस्कुराहट ने मारा 

बिछ गए कितने जमीन पे, जो बलखाई कमर 
तो कितनों को मार गई, उसकी तिरछी नजर

कहीं फूलों पे मंडराये, भँवरा जारो जार 
तो किसी को है, खिलती कली का इंतजार 

काले घने केशों में, कितने ही उलझ गये
तो कितने सुर्ख होंठों की, ताप में पिघल गये  

जुल्फों में बर्बाद हुये, कितने फरहाद मजनू नादान 
जो आजाद हुये बुद्ध तुलसी मोदी, तो कहलाये महान 

हसीनों के इस लड्डू का, हर कोई दिखता लोभी 
न खाए तो पछताये, और खा लिया तो और भी 

कह डीके कविराय, जो परमात्मा को पा जाते 
ऐसे ज्ञानी महात्मा भी, हसीनों को समझ न पाते 

Mar 6, 2023

जोगीरा स र र र र ...

ठंड नहीं कोहरा नहीं, बंद हो गई शीतलहर
बहुरंगी सा मौसम है, गर्मी का भी नहीं कहर
पुष्पों पर मँडराये भँवरा, गली गली व नगर नगर
कहीं दूर अल्हड़ बसंत की, बयार है आती स र र र र र
जोगीरा स र र र र र....
 
हुड़दंगी के त्योहार में होता, देखो कैसा उल्टा ढंग
रही न कोई उम्र की सीमा, बुड्ढा भी हो जाता यंग
जेठ ससुर भी इठलाते हैं, देवर बनकर बहु के संग
भाभी साली सलहज में तो, मचती रहती पूरी जंग
जीजा को दौड़ाये साली, जीजा भागे स र र र र र
जोगीरा स र र र र र....
 
गुझिया और मिठाई खा खा, पेट हुआ अब तंबू
भंग तरंग का प्रसाद बांटते, देखो शंकर शंभू
मेरा पेट भरो तो जानू, कपटी नेता कहे पुकार
खा जाता मैं देश ही पूरा , लेता नहीं डकार 
मुझको कैसे रंग पाओगे, मैं तो हूँ एक रंगा सियार
घोटाले का पैसा मैं, स्विश बैंक में डालू स र र र र र
जोगीरा स र र र र र....
 
पिता मरे तो जायदाद में, खड़ी हुई ऊँची दीवार
छोटे और बड़े भाई में, बढ़ती गई बड़ी तकरार
मायूस खड़ी भाभी फागुन में, देवर उधर था पड़ा उदास
बेरंगी हो गई जिंदगी, पिछला फागुन था कितना बिंदास
पिचकारी की धार मार दी, भतीजे पप्पू ने ऊपर छत से
गुस्से में आकर चाचा ने, भर बाल्टी उछाल दी झट से
पप्पू तक तो न पहुँचा, पर बैठी भाभी हुई सराबोर
भाभी ने भी पलट देवर को, बहुरंगों से दिया झकझोर   
बड़े भैया भी हुये धूसरित, जब छोटे ने फेंक दिया गुलाल
भैया ने उठकर गले लगाया, खत्म हुआ दिल का मलाल
रंग भरे फागुन जीवन में, दिलों को जोड़ता स र र र र र
जोगीरा स र र र र र....

Nov 23, 2022

संस्कारों में छिपा विज्ञान

जन्मकाल शैशव बचपन से, यही हम सुनते आये
धर्म पूजा सब हैं ढकोसले, इनके पास कभी न जाये
गँवार अनपढ़ अंधविश्वासी, इन सबको बहुत सुहाये
तर्क और विज्ञान विहीन यह, कोई तो इन्हें बताये

बालीवुड भी है सघन विरोधी, नहीं मानता वेद पुरान
बाबा स्वामी बस फिरकी लेते, कहता है आमिर खान
तनिक अपने गिरेबान में झाँको, यही गोला मा है तालिबान
मासूमों का कत्ल करे, जग को बना दिया शमशान   
खाला के घर बेटी ब्याहे, चार निकाह करे साहिबान

सौ बातों की एक कहूँ मैं, सुन लो साधो कान लगाय
विज्ञान सनातन में भरा पड़ा, क्या देता नहीं दिखाय
ग्रह नक्षत्र अमावस ग्रहण, पण्डित पञ्चाङ्ग सब दियो बताय
सटीक गणना युगों पुराना, जब पाषाणकाल मा अंग्रेज रहा विचराय

दक्षिण पैर कभी न सोवो, कहती रटती मेरी माता
नहीं मानता, यदि विज्ञान का शिक्षक पाठ नहीं पढ़ाता
पृथ्वी चुंबक के नॉर्थ पोल से, मैग्नेटिक फोर्स है आता (भारत उत्तरी गोलार्ध में है)
रक्तखनिज मस्तिष्क में रुककर, ब्रेन हैमरेज कर जाता

तुलसी पीपल के तले पूजा से, मिले आक्सीजन भरपूर
सूर्य नमस्कार के विटामिन डी से, बने हड्डियाँ मजबूत

पाचन तंत्र को दुरुस्त कर जाता, हमारा धार्मिक उपवास
कैंसर कोशिकाओं का शमन करे, कहे वैज्ञानिक बिंदास

घंटा शंखध्वनि तरंगों का रेजोनेन्स, नष्ट करे कीटाणु
फेफडों को शक्ति देता, निकट न आए करोना विषाणु

दो वर्षों का लाकड़ाऊन, विश्व को पढ़ा गया यह पाठ
नमस्ते अभिवादन अपनाकर ही, जीवन जियेगा ठाठ

हथेलियों के मध्य हैं स्थित, अक्यूप्रेशर के अगणित बिन्दू
नमस्ते करो और रोग भगाओ, कहता है हमारा धर्म हिन्दू

सीलन फंगस कीटाणुओं से, यदि बचाना है अपना भवन
धूप घी कपूर की धूनी भर दो, करते रहो नियमित हवन

ॐ का अलौकिक उच्चारण, जगा दे अंतरचेतन खासा
अंतरिक्ष में चलता यही सिग्नल, माने अमरीका का नासा

आदर सम्मान आशीर्वाद मिले, कमर लचीला होय
बड़े बुजुर्गों का पैर छूकर, यदि दंडवत करे हर कोय

स्नान ध्यान कर भोजन खाओ, रोग भगाओ भ्राता
वरना पाचन तंत्र माँगे रक्त, पर वो त्वचा को जाता

रात्रिभोजन बाद मस्तिष्क को रक्त मिले न, वह पाचन में जाय
जल्द सोवो दो आराम भेजे को, निशाकाल में नींद भी अच्छी आय
दिमाग शरीर स्फूर्तिवान बने, यदि विद्यालय जाता सुबह नहाय
कठिन विषय ही पहले पढ़ाते, रक्तसंचरित मन रहा चकचकाय

नीचे बैठ जमीन पर, यदि हो खाना पैखाना
तो बुढ़ापे में काहे को, घुटने का दर्द बौराना

माया की भागदौड़ से थमकर, हो जाओ संस्कारों में सरेंडर
आस्था विज्ञान का अनोखा संगम, कहता है कवि धरमेन्दर

Oct 18, 2022

मित्र

बड़े दुखी थे लोग
निष्ठुर जीवन के झंझावातों से
रिश्तेदार के तानों से
कार्यालय में बॉस की डाँटों से
बढ़ती महँगाई के ग्राफों से
पत्नी की फिजूल खरीदारों से
परीक्षा में कठिन सवालों से
पड़ोसी के व्यंगबाणों से
बच्चों की अवज्ञाओं से
क्रिकेट में पारी की हारों से
प्रियतमा की बेरुखी अदाओं से
बहुत दुखी थे

सब लोग मिल बैठ मशवरा करने लगे
ज्ञानी पंडितों की छाँव में उपाय खोजने लगे
सुबह शाम ईश्वर उपासना ध्यान में रमने लगे
कैलाश पर्वत की तरफ वो सभी चलने लगे
रुकते नहीं पाँव में छाले भले पड़ने लगे
मानसरोवर जा पहुँच फिर सभी थमने लगे

त्राहिमाम करते सभी हे शंभू अब लियो बचाय
दारुण दुख से उबरने का कुछ तो करो उपाय
यज्ञ पूजा क्या करें हमको दियो बताय
खर्च की परवाह नहीं बस रास्ता दो दिखलाय
कर्णप्रिय वाणी शंकर की सबको पड़ी सुनाय
बतलाता हूँ अचूक नुस्खा सुन लो ध्यान लगाय

सौ रोगों की एक दवा जो स्वयं तुम्हारे भित्र
दुख दारुण हर लेता जीवन महकाता जैसे इत्र
अगल बगल ही रचे बसे हैं उसके कितने चित्र
जीवन पथ में ढूंढ ले बंदे जिसे लोग कहते हैं मित्र

तनाव तुम्हारा हर लेता यह, अवसादों से करता दूर
विपत्ति काल में खड़ा मिलेगा, जैसे कोई सैनिक शूर
नहीं है कोई रिश्ता इससे, फिर भी सौ रिश्तों से पूर
बाँट लेता यह गम के आँसू, बिखराता है खुशी का नूर
टॉप गियर में गाड़ी दौड़ा देगा, हो चाहे चार पैग में चूर
तुरंत एक आवाज पे चल दे, छोड़ के जन्नत वाली हूर

बाँट सको जीवन के सारे गुप्त रहस्य,
दिखता नहीं है जग में, ऐसा कोई नाता
दादा नाना चाचा ताऊ, बुवा पिता या माता
जीजा साली भाभी पत्नी, या भगिनी और भ्राता
दिल पर रखा भारी बोझ यह, तभी हल्का हो पाता
भरोसेमंद मित्र संग बैठ जब, सारा हाल कह जाता

विदेशी चकाचौंध क्या, तोड़ भागूँ इंद्रलोक के ताले
मिल जाय बिछड़े यार संग, यदि जाम के चंद प्याले
जीवन यह पूर्ण कर डीके, जब भी ऊपर जायेगा
ऐसी gsw मित्र मंडली, वहाँ भी प्रभु से माँगेगा

Dec 20, 2021

बुजुर्ग-व्यथा

सुदूर ग्रामीण आँचल मे जन्मे जटा का जीवन अत्यंत संघर्षपूर्ण रहा था। इनका पूरा नाम था जटाशंकर नारायण चतुर्वेदी। अब जैसा कि नाम से ही विदित है, इनके परिवार के हर सदस्य को चारो वेदों का ज्ञान होना चाहिये। समाय बदला, काल और युग बदल गया। न संस्कृत पढ़ने वाले रहे न ही वेद पुराण कंठस्थ करने वाले। सो जटाशंकर को भी उसके पिता ने हिन्दी अँग्रेजी वाले शिक्षालय मे ही प्रवेश दिलाया।

ग्राम से नगर तत्पश्चात महानगर तक जटा ने जीवन के कई थपेड़े खाये। घाट घाट का पानी पिया। कहीं जल मीठा मिला कहीं कड़वा और दूषित। किन्तु हर जल-पान ने उन्हें जीवन के कडवे मीठे अप्रतिम अनुभव प्रदान किये। इन सभी अनुभवों से सीख लेता, उनकी गठरी बनाता जटा जीवन की डगर पे आगे बढ़ता गया। उसका यही मानना था, एक बार की गई गलती शिक्षा देती है, अनुभव देती है। किन्तु उस गलती को दोहराने वाला मूर्ख है। क्या ही अच्छा हो यदि हर मनुष्य गलतियों का अनुभव साझा करता जाये हर किसी से, जिससे अन्य व्यक्तियों को इसका लाभ मिले।
सो उसने अपना पेशा भी उसी के अनुरूप बना लिया। एक कंसल्टेंसी कंपनी मे उच्च पद प्राप्त कर अन्य कंपनियों को देने लगा परामर्श। उसके परामर्श देश-विदेश तक विख्यात हो चले। विदेशों मे भी तैनाती हुई कई वर्ष। अपने पेशे मे इतना विलीन हो चला जटा कि घर परिवार की सुध बुध भी न रही। फिर आ गया जीवन का पतझड़। व्यस्त कॉर्पोरेट जिंदगी से इतर अपने गाँव देश व परिवार से जुडने की आकांक्षा लिये जटा अंततः आ पहुँचा वापस स्वदेश। अब उसकी आकांक्षा थी अपने बच्चों के साथ अपने अनुभव साझा करने की। किन्तु घर का माहौल देख व्यथित हुआ। बच्चे सुबह देर तक सोये पड़े थे।
जटा, ”पुत्री, सुखी व स्वस्थ जीवन व्यतीत करना है तो सुबह सवेरे उठा करो”।
पुत्री, ”क्यों? देर से उठने मे कौन सी समस्या आ जायगी पिताश्री?”
जटा, ”हमे अपनी बॉडी क्लॉक को सन क्लॉक से मैच करके रखना चाहिये। सूर्य के कारण ही समग्र सौरमण्डल ऊर्जावान है। भारत ही नहीं अंग्रेजों ने भी कहा है, early to bed and early to rise, makes a man healthy wealthy and wise. इसलिये सूर्य के अस्त होने के कुछ समय पश्चात निद्रासीन व सूर्योदय से पूर्व शय्या त्याग कर देना चाहिए”।
पुत्री, ”यदि ऐसा है तो अति-उत्तरी गोलार्ध के देशवासी जैसे रूस, इंग्लंड, कनाडा इत्यादि को सर्दियों मे मात्र तीन-चार घंटे ही सोना चाइए। क्योंकि रात दस बजे सूर्यास्त होता है और दो बजे सूर्योदय। ध्रुव-वासियों को तो छ महीने सोना ही नहीं चाहिए। एवं गर्मियों मे लगातार छ महीने सोते ही रहना चाहिये।
ऐसे अकाट्य तर्क कि आशा न थी जटा को। कुछ उत्तर न सूझा। समग्र विश्व को परामर्श देकर पैसा कमाने वाला अपने ही घर मे निरुत्तर हो गया। कुछ दिनो पश्चात पुनः ज्ञान देना आरंभ किया।
जटा,”तुम्हें अब विवाह कर लेना चाहिये”।
पुत्री,”क्यों?”
जटा,”शास्त्रों मे कहा गया है, पचीस वर्ष के बाद गृहस्थ आश्रम आरंभ होता है। विवाह की यही सही उम्र है”।
पुत्री,”पर विवाह करना ही क्यों?”
जटा,”पुत्री, हम माता-पिता कब तक तेरा साथ देंगे। एक दिन चले जाएँगे। तब कौन तेरा साथ देगा?”
पुत्री,”मुझे किसी का साथ चाहिए ही नहीं। विवाहोपरांत बहुत झंझट है। मैं किसी के साथ कोई समझौता नहीं करना चाहती। विवाह नाम ही समझौते का है। न करो समझौता तो विवाद होगा। मुझे अपना जीवन अपने हिसाब से जीना है। उसमें किसी कि दखलंदाजी नहीं चाहिए”।
जटा,”हर किसी को एक साथी चाहिये। यदि तुम रुग्ण हो गई तो कौन देखभाल करेगा? परवीन बाबी अकेले ही अपने घर मे मरी पाई गई, उसके मरने के कई दिन बाद जब दुर्गंध आने लगी”।
पुत्री, “तो क्या हुआ। मरना तो एक दिन है ही। मरने के बाद क्या सोचना किसी को पता चले या न चले। दुर्गंध आए या सुगंध। रुग्ण होने पर एम्ब्युलेन्स फोन पे आ जाती है। मेरे कई मित्र भी हैं जिन्हें बुलाया जा सकता है”।
ऐसा ही वाद-विवाद चलता घंटों। जटा को लगा आज के बच्चे इतने आसान नहीं हैं। कॉर्पोरेट क्लाईंट को समझाना अधिक आसान है, पर आज के बच्चों को नहीं। कई दिनों के प्रयास के पश्चात उन्होने एक अंतिम बाण चलाया। संवेदनशील बाण।
“पुत्री, मैं तेरा पिता हूँ। मेरी बात मान ले। मैं न होता तो तू इस दुनिया मे ही न आती। कृतज्ञ होना चाहिये तुझे”।
“न आती तो क्या हो जाता? जनसंख्या ही कुछ कम रहती”।
“अरे मैंने तुझसे अधिक दुनिया देखी है। मुझे अधिक अनुभव है। क्या गलत और क्या सही, इसका ज्ञान मुझे तेरे से अधिक है। मैं चाहता हूँ तुझे मेरे अनुभव का लाभ मिले”।
“बहुत बहुत धन्यवाद। पर मुझे इसकी आवश्यकता नहीं है। आप की पीढ़ी आउट डेटेड हो चुकी है”।
जटा शंकर बड़े विक्षिप्त हुये। हा विधाता, जीवन के अंतिम पड़ाव पर इतने सारे अनुभव समेटे हुये आज के बुजुर्ग अपना ज्ञान साझा करना चाहते हैं। वो ज्ञान जो उन्होने ठोकरें खा खा कर प्राप्त किये। किन्तु उसे लेने वाला ही कोई नहीं आज की पीढ़ी में। कंपनी ने तो उन्हे सेवानिवृत्ति दी ही, बच्चों ने भी दे दी।

Dec 15, 2021

गृहनगर

बचपन से सुनते आए थे, असली भारत देखना है तो गाँवों में जाइये। देश की 90% जनसंख्या वहीं रहती है। अब चूंकि हम स्वयं ग्रामीण परिवेश से ही आते हैं, शिक्षा व बेहतर जीवन यापन हेतु भले ही नगरों/ महानगरों में रहते रहे हों, भीतर हृदय की गहराइयों में सर्वदा कहीं कसक रही कि सेवानिवृत्ति पश्चात शेष जीवन अपने ग्राम में ही बसर करेंगे। ग्राम में यदि न भी रहे तो निकट वाले किसी नगर में डेरा डालेंगे।

इस बीच लंबे अंतराल के लिए विदेशों में तैनाती हो गई। वर्ष में दो एक बार ही स्वदेश आना हो पाता था, वो भी अल्प समय के लिए। भागते हुये कभी कभार ही गाँव/गृहनगर देख पाते थे उड़ती निगाहों से। निकट ठीक से देख न पाया। इस वर्ष जब स्वदेश वापसी हुई, मुख्यालय स्थानांतरण पश्चात, तभी से मौके की तलाश में था।
दस दिनों के भीतर तीन विवाह की तिथियाँ आई। तीनों करीबी रिश्तेदारों के। विवाह-स्थल भी मेरे परम प्रिय, वही जो मेरे हृदय के भीतर की असीम गहराइयों में समाए थे, गोरखपुर, वाराणसी व प्रयागराज। दस दिन का अवकाश मिलना आसान तो था नहीं, पर किसी तरह कार्यालय में लड़ झगड़ अनुमोदन करा ही लिया। तीनों नगरों के अनुभव कमोवेश एक जैसे ही रहे। दरअसल ये तीनों नगर नहीं महानगर हैं यूपी के।
प्रातःकाल ब्राम्ह-मुहूर्त में शय्या त्याग देना मेरी आदत रही है विगत कई दशकों से। तत्पश्चात प्रातः भ्रमण और योग प्राणायाम। कुल मिलाकर सब कुछ एक घंटा। वहाँ पहुँचते ही सुबह उठ चल पड़े भ्रमण को, लेकिन बाहर मार्ग में सड़क पर धूल बहुत थी। यहाँ नोएडा में सड़क के बगल ईंट का फुटपाथ, फिर गार्डन जिसमें हरी घास व वृक्ष लगे होते हैं। धूल के लिये कहीं कोई जगह नहीं, सिवाय तब जब राजस्थान से आंधी आ जाए। लेकिन वहाँ ऐसा न था। नाक पर रुमाल या मास्क रखने के पश्चात भी राहत न मिलती थी। जूते अलग से धूसरित हो रहे।

बड़ी खोज बीन की, मगर नोएडा जैसे पार्क न मिले कहीं। मुख्य चौड़े मार्ग पर वाहनों की अधिकता से भीषण प्रदूषण, तो अंदर सकरी गलियों में सड़क के बाद सीधे मकानों की सरहद। वृक्ष लगाने के लिए स्थान की तो बात ही क्या करनी, यदि एक वाहन खड़ा करके कोई अपना समान उतारने लगे तो पीछे अन्य वाहनों की कतार लग जाय। पार्क व पार्किंग दोनों का आभाव।
सोचा फ्लैट देखा जाय। वहाँ अवश्य माहौल बेहतर होगा। फ्लैट वर्टिकल स्पेस लेते हैं, इसलिये हॉरिजॉन्टल स्पेस खाली मिल जाता है। अवश्य काफी खुला मैदान होगा पार्क इत्यादि के लिये। किन्तु वहाँ अंदर कोई पार्क, स्विमिंग पूल, वॉकिंग ट्रैक दृष्टिगोचर न हुआ। फ्लैट भी पास पास एक दूसरे से हाथ मिलाते हुये। टावरों के बीच की आवश्यक दूरी नजर न आई। नोएडा फ्लैट की बालकनी में खड़े हो जाने पर दूर तक विहंगम दृश्य दिखता है, लेकिन वहाँ दिखे बगल के फ्लैट की रसोई अथवा शयन-कक्ष। एफ ए आर के मानक का कोई न्यूनतम स्तर नहीं है वहाँ।
दाम सुना तो पैरों तले जमीन खिसक गई। नोएडा का दुगुना या तिगुना। जमीनो पर बने मकान तो उससे भी डबल। जमीन की ही कीमत इतनी अधिक कि उतने में नोएडा के दो फ्लैट आ जाय। धन्यवाद दीजिये सुश्री माया बहन को जिनकी वजह से नोएडा में फ्लैटों की धकापेल हो गई। इतने बन गये कि लेने वाले ही बाजार से गायब हो गये। इतने कम कीमत पर इतनी सुविधाओं के साथ, जहाँ प्रत्येक सेक्टर में धुँवाधार हरे भरे पार्क भरे पड़े हों, छोड़ दोगुनी कीमत पर कोई भला क्यों जाए? नीचे एक चित्र में आप देख सकते हैं यहीं बगल गाजियाबाद में 5 लाख की फेंकू कीमत पर फ्लैट उपलब्ध है। इतने में तो बनारस में आपको दो गज जमीन भी नसीब न होगी।
हर वस्तु की होम डेलीवेरी हो जाती है। वाहन की बैटरी कमजोर हो चली थी। स्टार्ट न हो रही थी। अनलाइन ढूँढा। चार हजार में घर पे आकर लगा गया। बाद में पता किया दुकान पर वही बैटरी पाँच हजार से भी अधिक कीमत पर थी। महानगर दिल्ली जैसी ये सुविधायें अन्य नगरों में फिलहाल अभी उपलब्ध नहीं हैं। वाराणसी में घंटों इंतजार के पश्चात भी एक टैक्सी न मिली ओला/ उबर से और यहाँ रेल लगी पड़ी है। टैक्सी के अलावा दिल्ली मेट्रो है। नोएडा मेट्रो हैं। डीटीसी की बसें हैं। यातायात के लिए तो कोई झंझट ही नहीं।
दिल्ली गुड़गांव भी नोएडा जितना खुला-खुला नहीं है। अब तो एशिया का सबसे बड़ा अंतर्राष्ट्रीय विमानस्थल, फिल्म सिटी, उद्योग, सैमसंग मोबाईल फैक्ट्री, माल सभी कुछ यहीं है। दिल्ली में माल भी नहीं क्योंकि खाली स्थान नहीं बचे। देश-विदेश कहीं भी जाना हो तो सभी साधन उपलब्ध। देश का कोई प्रांत नहीं जहाँ के लिए यहाँ से ट्रेन व वायुयान न मिलते हों। विश्व में कहीं जाना हो, भारत के हर कोने से लोग यहीं दिल्ली आते हैं। हर स्थान से सीधा जुड़ाव। यदि आप को समय काटना हो तो निकल जाइये उद्योग मेला, पुस्तक मेला, दिल्ली हाट, रंगमंच, नाट्यशाला। ऐतिहासिक स्थल पे बैठ जाइए। दरियागंज हो आइए रविवार यदि सेकंड हैंड सस्ती पुस्तकें चाहिये। सेवानिवृत्ति बाद भी काम करना हो तो यहाँ ही नौकरी मिलेगी। नहीं करना हो तो देशाटन के लिए हर साधन। बस एक समस्या है नोएडा में। अक्तूबर-नवंबर में पराली प्रदूषण का प्रकोप। लेकिन बारहों महीने झेलने से बेहतर है एक महीना झेला जाए। वैसे सरकार प्रयत्नशील है, भविष्य में कोई हल निकलेगा ही।
अब हम कहीं नहीं जाने वाले। जायेंगे भी तो बस अपने ग्राम, जहाँ धूल प्रदूषण नहीं। आते जाते रहेंगे कुछ दिन के लिये। ट्रेन-वायुयान मार्ग से सीधा जुड़ाव है ही। गरीब रथ यहीं बगल आनंद विहार से मिल जाएगी, जो सीधे प्रतापगढ़ उतारेगी। नीचे चित्र में दिखाये सारे पार्क व मनोहारी उद्यान मेरे निवास से मात्र 25 मीटर की परिधि में हैं। प्रथम चित्र गोरखपुर का जबकि अन्य सभी नोएडा के हैं।
काम दाम में इतनी अधिक सुविधायें,
भला कोई क्यों नोएडा छोड़ के जाये।

विवाह

विगत 20 दिनों में हम पाँच विवाह समारोहों में सम्मिलित हुये। सोचा कुछ स्याही बिखेर दूँ।

कुछ पुराना याद आ गया। बचपन याद आ गया। लोगों का जीवन स्तर इतना बेहतर नहीं था। वेतन की तुलना में जीवन यापन मूल्य अधिक था। परिवार नियोजन मार्गों से अंजान लोगों के बच्चे भी थोक में होते थे। जिन्हें नियोजन ज्ञान था भी तो संसाधनों का आभाव अथवा उन्हें क्रय करने का संकोच आड़े आता था। एक कमाने वाला और आठ दस खाने वाले। सम्पूर्ण जीवन दो जून की रोटी जुगाड़ने में ही निकल जाता।
अब ऐसे में यदि कोई छप्पन भोग की बात करे तो हंसी ही आयेगी। आते जाते कोई मेहमान मिष्ठान्न ले आ टपका तो थोड़ा जीभ का स्वाद बदल जाता था। लेकिन वर्ष दो वर्ष में एक अवसर था जब जी भर के व्यंजन जीमने का मौका मिलता था। वह मौका होता था विवाह। परंतु हर विवाह नहीं। यदि कन्या विवाह है तब तो आप मजदूर की तरह जोत दिए जायेंगे। लेकिन सौभाग्य से आप वर पक्ष की तरफ से निमंत्रण पा गये तब तो फिर पौ बारह। लेकिन कैसा भी विवाह हो, वर या वधू, नियत तिथि से काफी पहले ही लोगबाग आ के घर में पैठ बना लेते थे। विवाह से पहले तिलक होता था। तिलक-विवाह के बीच दस-पंद्रह दिनों में ढेर सारे रीति रिवाज। गर्मी की छुट्टियों में ही अधिकतर होते थे विवाह जब लोगबाग विद्यालय के कार्यभार से मुक्त होते थे। अतः ज्यादा करीबी लोग महीने भर पहले भी जम जाते। जहां कहीं भी पड़ के रह लिए, बाग बगीचे में किसी भी पेड़ के तले। व्यंजन भले न मिले पर खेत में उपजी दाल रोटी सबके लिए पर्याप्त थी। यह काल बच्चों के लिए किसी उत्सव से कम नहीं था। खूब सारे लोग, खूब सारे खेल कूद। कुछ नहीं तो ताश के फड़ बिछ जाते। दहला पकड़ या ट्वेंटी नाइन।
विवाह की तैयारियों में भी लगे रहते। सर्फ में कुर्ता धोया, फिर उसपे नील टिनोपाल चढ़ाया। कुछ ज्यादा ही शौकीन लोग उसापे कफ भी चढ़ाते थे, चावल का माड़ या ऐसा ही कुछ। कुर्ता कुरकुरा कडक हो जाता था। बस में सवार हो बारात बाजे गाजे के साथ विदा होती। बारात पहुँचने के साथ ही आरंभ हो जाती सबकी आवभगत। किसी विद्यालय में बारात टिकाई जाती। वो न मिले तो खेत या बाग बगीचे भी पर्याप्त थे। इस बारात पार्किंग स्थल को कहते थे जनवासा। गाँव भर से खटिया इकट्ठी कर बिछा दी जाती थी। बस से उतरते ही सभी बाराती दौड़ पड़ते अपनी अपनी खटिया कब्जा करने। कुछ ढीले लोग वंचित रह जाते खटिया से और फिर उनके पास अगले तीन दिनों तक मुँह फुलाने और खामियाँ निकालने का ही मार्ग शेष रहता।
इस बारात की खातिरदारी होती रहती अगले तीन दिनों तक। हर बाराती के अलग नखरे। कहीं फूफा नाराज तो कहीं जीजा। सबसे अधिक नाराज होने का अधिकार होता था दूल्हे को। खिचड़ी रस्म रखी ही गई थी उसे यह विशेषाधिकार देने हेतु। माँग वत्स क्या चाहिये ससुर से। इसी माँग पर विवाह का भविष्य निर्भर होता था, सफलता अथवा असफलता का। कई बारातें लौट जातीं माँग पूरी न होने पर। लेकिन माँग छोटी ही होती, साइकिल घड़ी या रेडियो। कुछ लोग गाय भैंस भी देते थे। कालांतर में इस खिचड़ी व्यवस्था ने वीभत्स रुप ले लिया। लोगों की मांगें बढ़ती गई। साइकिल से स्कूटर बाइक और फिर कार। अंत जो भी हो, बारातियों के तो मजे ही मजे होते थे। तीन दिन का जबरदस्त खानपान। ठंडाई, शरबत, ढेर सारे व्यंजन, मिठाई, नमकीन.... वगैरह वगैरह। बारात की खातिरदारी के किस्से वर्षों लोग सुनाते चटकारे ले लेकर।
समय बदला। समाज बदला। जीवन की आपाधापी में लोगों के पास इन सब उत्सवों के लिए समय कम पड़ने लगा। फास्ट फूड, फास्ट लाइफ का दौर आया। तीन दिन विवाह का स्थान ले लिया एक दिन ने। फिर वह भी कम हुआ मात्र एक रात का। तारों की छाँव में दुल्हन को विदा कर देना है, यानि सूर्योदय से पूर्व। तदपि कुछ लोग पुरातन व आधुनिक युग के बीच झूलते रहे। विवाह तिथि से दो दिन पूर्व संगीत संध्या आयोजित कर डालते हैं। बाहर से भी कई लोग आमंत्रित हो जाते हैं। लेकिन यह पुरातन पद्धति आधुनिक युग के बदले परिवेश में चल नहीं पाती। विवाह अब गर्मियों के स्थान पर सर्दियों में होने लगे हैं। नगरों में होने लगे हैं। गाँव में तो ग्रीष्म ऋतु में कहीं भी खाट बिछा पड़ जाओ, किन्तु नगरों में तो एक एक इंच की कीमत देनी होगी। बिस्तर कमरा हर एक चीज की व्यवस्था। लोगबाग भी नाजुक हो चले हैं, सामन्यतः सभी का जीवन स्तर पहले से उच्च हो गया है, स्नान हेतु गरम जल चाहिये। यानि गीजर भी हो।
लोग बाग विवाह में पहुँच तो जाते हैं, किन्तु इन सब व्यवस्थाओं की अनुपलब्धता उन्हें व्यथित करती है। महीने भर टिकने वाले अब तीन दिन टिकने में भी असहज हो जाते हैं। कहीं एक हाल में दर्जन भर लोग, कहीं दो कमरों में दस लोग। वरना विवाह का अव्यवस्थित घर तो है ही, रह सकते हो तो रह लो। मात्र दो सदस्यों के लिए अपने घर में तीन-चार टॉइलेट रखने वाले यहाँ सुबह टॉइलेट की लंबी लाइन में पेट दबाए पड़े रहो। इन सबसे निजात पाने के लिए कुछ स्मार्ट लोग अगल बगल किसी अन्य रिश्तेदार या जान पहचान के यहाँ धीरे से कट लेते हैं। क्योंकि खुलेआम छोड़कर जाने से रिश्तों में खटास आने का अंदेशा रहता है। धनाढ्य पैसे वाले तो सीधे होटल में ही आ के रुकेंगे अपने पैसे से। और जो सबसे अधिक स्मार्ट हैं, वो तो बस विवाह-संध्या को ही आयेंगे और जयमाल पश्चात रवानगी। एक विवाह में तो होटल में दो दिन रहने के पश्चात ठीक विवाह वाले दिन ही होटल वाला कमरा खाली करने को बोल गया। कारण जो भी रहा हो, लेकिन यह यजमान व मेहमान दोनों के लिए असहजपूर्ण व कष्टदायक रहा। एक ही संध्या को लोगबाग लाखों करोड़ों उड़ा देते हैं, सजावट तथा खानपान में। भला एक वक्त में कोई क्या-क्या और कितना खा पाएगा। विवाह व्यय तो पहले से कई गुना बढ़ा, किन्तु मजा पहले वाला न रहा। दो-तीन घंटों के आयोजन संध्याकाल में कौन आया कौन गया, पता भी नहीं चलता, जबकि बचपन में एक महीनों के संसर्ग में अमिट छाप छोड़ जाने वाली यादें जीवन भर साथ देती थीं।
कोई लौटा दे मेरे बीते हुये दिन।